मई 2004 की बात है। कोलकाता के विद्यासागर सेतु पर एक एक्सीडेंट होता है। गोलियां चलती हैं। तीन जिंदगियां टकराती हैं। और बस, वहीं से हिंदी सिनेमा का एक ऐसा पन्ना लिखा जाता है जिसे आज हम Yuva movie के नाम से जानते हैं। मणि रत्नम की इस फिल्म ने उस दौर में वो कर दिखाया था जिसकी हिम्मत शायद ही कोई और डायरेक्टर जुटा पाता।
ईमानदारी से कहूं तो, जब यह फिल्म रिलीज हुई थी, तब लोग थोड़े कन्फ्यूज थे। क्यों? क्योंकि इसकी कहानी सीधी नहीं चलती। यह एक hyperlink cinema का उदाहरण थी, जहां एक ही घटना को अलग-अलग नजरियों से देखा गया। आज 20 साल बाद भी जब हम इस फिल्म को मुड़कर देखते हैं, तो समझ आता है कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय युवाओं के गुस्से और उम्मीदों का एक कच्चा चिट्ठा (Raw document) थी।
Yuva Movie: आखिर क्यों यह फिल्म आज भी उतनी ही रिलेवेंट है?
अक्सर लोग सोचते हैं कि यह सिर्फ एक पॉलिटिकल थ्रिलर है। गलत। यह असल में तीन अलग-अलग विचारधाराओं का टकराव है। अजय देवगन का किरदार, माइकल मुखर्जी, उस छात्र नेता पर आधारित था जो असल जिंदगी में हैदराबाद के उस्मानिया यूनिवर्सिटी के George Reddy से प्रेरित था। वह आदर्शवाद का चेहरा है।
दूसरी तरफ अभिषेक बच्चन का लल्लन सिंह है। वह समाज के उस हिस्से से आता है जहां सर्वाइवल ही सबसे बड़ा सच है। वह हिंसक है, अनप्रेडिक्टेबल है और शायद अभिषेक के करियर की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस है। फिर आता है विवेक ओबेरॉय का अर्जुन, जो बस अमेरिका भागना चाहता है। उसे देश की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है, जब तक कि वह खुद उस सिस्टम की मार नहीं झेलता।
मणि रत्नम ने इन तीनों को एक पुल पर मिलाया। और यहीं से शुरू होती है असली कहानी। फिल्म का असली हीरो कोई इंसान नहीं, बल्कि वह बदलाव की सोच है जो युवाओं के मन में दबी होती है।
विजुअल्स और म्यूजिक का वो जादू
रवि के. चंद्रन की सिनेमैटोग्राफी की बात किए बिना यह चर्चा अधूरी है। आपने गौर किया होगा कि हर किरदार के लिए एक अलग कलर पैलेट इस्तेमाल किया गया था।
- माइकल (अजय देवगन) के हिस्से में हरा (Green) रंग ज्यादा दिखता है, जो स्टेबिलिटी और प्रगति का प्रतीक है।
- लल्लन (अभिषेक बच्चन) के सीन्स में लाल और गहरे शेड्स हैं, जो उसके गुस्से और खतरे को दर्शाते हैं।
- अर्जुन (विवेक ओबेरॉय) के लिए नीला (Blue) रंग चुना गया, जो उसके शुरुआती लापरवाह और सपनों वाले स्वभाव को दिखाता है।
और फिर आता है ए.आर. रहमान का संगीत। 'धक्का लगा बुक्का' सिर्फ एक गाना नहीं था, वह उस दौर के स्टूडेंट्स के लिए एक एंथम बन गया था। गुलजार साहब के बोल और रहमान की वो 'एजी' बीट्स आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं। फिल्म के डायलॉग्स अनुराग कश्यप ने लिखे थे, इसलिए उनमें वो गलियों वाली मिट्टी और कड़वाहट महसूस होती है।
बॉक्स ऑफिस पर क्या हुआ था?
सच तो यह है कि रिलीज के वक्त यह फिल्म कोई बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर नहीं थी। इसे 'एवरेज' या 'फ्लॉप' की कैटेगरी में भी डाला गया था। दिल्ली और पंजाब जैसे इलाकों में डिस्ट्रीब्यूटर्स को नुकसान हुआ था। लेकिन मुंबई और विदेशों में इसे पसंद किया गया।
फिल्म ने फिल्मफेयर में धूम मचा दी थी। अभिषेक बच्चन को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर और रानी मुखर्जी को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला। अभिषेक के लिए यह फिल्म उनके डूबते करियर के लिए लाइफबोट साबित हुई। इससे पहले उन्हें सिर्फ "अमिताभ का बेटा" माना जाता था, लेकिन लल्लन सिंह बनकर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।
युगांतरकारी बदलाव या सिर्फ एक फिल्म?
कई लोग क्रिटिसाइज करते हैं कि फिल्म का अंत बहुत फिल्मी था। छात्र चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच जाते हैं और सब कुछ रातों-रात बदल जाता है। असल जिंदगी में ऐसा नहीं होता। यह बात सही है। राजनीति इतनी आसान नहीं है। लेकिन मणि रत्नम का मकसद शायद सॉल्यूशन देना नहीं, बल्कि सवाल उठाना था।
क्या एक पढ़ा-लिखा युवा वाकई राजनीति में आकर गंदगी साफ कर सकता है? क्या हम सिर्फ अमेरिका जाने का सपना देखते रहेंगे या अपनी गलियों के कीचड़ को साफ करने की जिम्मेदारी लेंगे?
कुछ अनसुने फैक्ट्स जो शायद आप न जानते हों
- कास्टिंग का खेल: आपको जानकर हैरानी होगी कि लल्लन सिंह के रोल के लिए पहले ऋतिक रोशन को अप्रोच किया गया था। वहीं माइकल के रोल के लिए शाहरुख खान पहली पसंद थे। सोचिए अगर वो होते तो फिल्म कैसी होती?
- दो वर्जन: यह फिल्म एक साथ तमिल में भी शूट हुई थी जिसका नाम 'Aayutha Ezhuthu' था। उसमें सूर्या, माधवन और सिद्धार्थ लीड रोल में थे।
- सिनेमैटोग्राफी तकनीक: अभिषेक के सीन्स को हैंडहेल्ड कैमरों से शूट किया गया था ताकि एक तरह की बेचैनी (Edginess) पैदा की जा सके। वहीं अजय देवगन के सीन्स बहुत ही स्टेडी और बैलेंस्ड थे।
निष्कर्ष: क्या आपको इसे आज देखना चाहिए?
अगर आप आज के दौर की मसाला फिल्में देखकर थक गए हैं, तो Yuva movie आपके लिए एक रिफ्रेशिंग एक्सपीरियंस होगी। यह आपको सोचने पर मजबूर करती है। यह आपको गुस्सा दिलाती है और अंत में एक हल्की सी उम्मीद भी देती है।
आज के सोशल मीडिया और डिजिटल एक्टिविज्म के दौर में, माइकल मुखर्जी जैसे किरदारों की जरूरत और बढ़ गई है। फिल्म हमें सिखाती है कि राजनीति बुरी नहीं है, लेकिन अगर अच्छे लोग इससे दूर रहेंगे, तो बुरे लोग ही इस पर राज करेंगे।
अगले कदम: - अगर आपने इसे नहीं देखा है, तो नेटफ्लिक्स या अन्य ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर इसे जरूर देखें।
- ए.आर. रहमान का साउंडट्रैक दोबारा सुनें, खासकर 'कभी नीम नीम' और 'खुदा हाफिज', आपको फिल्म की गहराई समझ आएगी।
- इसके तमिल वर्जन 'Aayutha Ezhuthu' के साथ इसकी तुलना करें, आपको मणि रत्नम का विजन और बेहतर तरीके से समझ आएगा।