ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका के साथ किसी भी मेज पर बैठने को तैयार नहीं है। यह कोई छोटी बात नहीं है। जब दुनिया के दो सबसे बड़े दुश्मन बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद कर लेते हैं, तो उसका मतलब सिर्फ युद्ध की आहट या भयंकर आर्थिक अस्थिरता होता है। तेहरान से आया यह ताजा बयान दुनिया को यह बताने के लिए काफी है कि अब कूटनीति के दिन लद चुके हैं। मध्य पूर्व की बिसात पर अब केवल ताकत की आजमाइश बची है।
पश्चिमी मीडिया अक्सर इसे ईरान की हठधर्मी कहता है। लेकिन अगर आप थोड़ा गहराई में जाकर देखें, तो आपको समझ आएगा कि यह सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। ईरान को लगता है कि अमेरिका के साथ बातचीत करना समय की बर्बादी है क्योंकि वाशिंगटन अपनी शर्तों से कभी पीछे नहीं हटता। पिछले कुछ हफ्तों में जो कुछ भी लाल सागर और लेबनान की सीमाओं पर हुआ है, उसने आग में घी डालने का काम किया है।
शांति की आखिरी उम्मीद क्यों टूटी
ईरान के सर्वोच्च नेता और वहां के विदेश मंत्रालय के बयानों को गौर से देखें तो एक पैटर्न नजर आता है। उन्हें लगता है कि अमेरिका ने समझौते की हर गुंजाइश को खुद ही खत्म कर दिया है। 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) से हाथ खींचने के बाद से ही ईरान का भरोसा डगमगाया हुआ था। अब वे कहते हैं कि बातचीत का मतलब केवल अपनी संप्रभुता के साथ समझौता करना है।
जब अमेरिका ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए और हिजबुल्लाह जैसे समूहों को निशाना बनाना शुरू किया, तो तेहरान ने समझ लिया कि उसे अब अपनी रक्षा खुद करनी होगी। कूटनीति केवल एक छलावा बनकर रह गई है। ईरान का यह रुख बताता है कि वह अब झुकने के मूड में बिल्कुल नहीं है। वह जानता है कि बातचीत के टेबल पर उसे वह कभी नहीं मिलेगा जो वह चाहता है।
ईरान का सीधा तर्क है कि जब तक अमेरिका अपनी धौंस जमाना बंद नहीं करता, तब तक शब्दों का कोई मोल नहीं है। वे इसे 'दो-टूक जवाब' कह रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह एक चेतावनी है। यह चेतावनी उन देशों के लिए भी है जो बीच-बचाव करने की कोशिश कर रहे थे।
इजराइल और अमेरिका का गठजोड़
ईरान के गुस्से की सबसे बड़ी वजह इजराइल के प्रति अमेरिका का अटूट समर्थन है। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग ने ईरान को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि उसका असली दुश्मन कौन है। अमेरिका को वे 'ग्रेट सैटन' कहते हैं और उनका मानना है कि इजराइल को मिलने वाला हर हथियार सीधे तौर पर ईरान की सुरक्षा को खतरे में डालता है।
हमास और हिजबुल्लाह के नेताओं पर हुए हालिया हमलों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। ईरान ने देखा कि अमेरिका इन हमलों को रोकने के बजाय इजराइल को और अधिक सैन्य सहायता भेज रहा है। ऐसे में बातचीत का सवाल ही पैदा नहीं होता। तेहरान को लगता है कि अगर वह अभी बात करता है, तो इसे उसकी कमजोरी माना जाएगा।
प्रतिबंधों का असर अब बेअसर होने लगा है
अमेरिका सालों से ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को चोट तो पहुंचाई है, लेकिन उसे घुटनों पर नहीं ला सके। आज ईरान ने रूस और चीन जैसे देशों के साथ नए व्यापारिक रास्ते खोज लिए हैं। जब आपके पास तेल खरीदने वाले और हथियार बेचने वाले नए पार्टनर हों, तो आप अमेरिका की धमकियों को नजरअंदाज करना सीख जाते हैं।
ईरान की मुद्रा रियाल गिर रही है, महंगाई आसमान छू रही है, फिर भी वहां की सत्ता का मिजाज सख्त बना हुआ है। वे अपनी जनता को यह समझा चुके हैं कि यह सारी परेशानी अमेरिका की वजह से है। यह एक ऐसा राष्ट्रवादी कार्ड है जो ईरान की सरकार को अंदरूनी तौर पर मजबूती देता है। वे भूखे रह लेंगे लेकिन झुकेंगे नहीं—यही संदेश वहां की गलियों से लेकर संसद तक सुनाई देता है।
- तेल का खेल: ईरान ने गुप्त तरीके से अपना तेल बेचना जारी रखा है।
- ड्रोन टेक्नोलॉजी: रूस-यूक्रेन युद्ध में ईरानी ड्रोन्स की मांग ने तेहरान की ताकत को नया आयाम दिया है।
- क्षेत्रीय प्रभाव: इराक, सीरिया और यमन में ईरान का दबदबा अब भी बरकरार है।
इन सब चीजों ने ईरान को यह भरोसा दिलाया है कि वह अमेरिका के बिना भी जिंदा रह सकता है। बल्कि उसे लगता है कि अमेरिका से दूरी ही उसके हित में है।
मध्य पूर्व में बदलते समीकरण
अब वह दौर नहीं रहा जब अमेरिका के एक इशारे पर खाड़ी देश अपनी नीतियां बदल देते थे। सऊदी अरब और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकियां (चीन की मध्यस्थता से) वाशिंगटन के लिए एक बड़ा झटका थीं। ईरान को पता है कि अगर वह अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते बना लेता है, तो उसे अमेरिका की उतनी जरूरत नहीं पड़ेगी।
ईरान अब क्षेत्रीय ब्लॉक बनाने पर ध्यान दे रहा है। वह चाहता है कि बाहरी ताकतें इस इलाके से बाहर निकलें। उसका "नो टॉक विथ अमेरिका" का स्टैंड इसी बड़े प्लान का हिस्सा है। वह दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह मध्य पूर्व का नया केंद्र है और उसे किसी पश्चिमी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है।
अमेरिका की अगली चाल क्या होगी
बाइडेन प्रशासन या आने वाली किसी भी अमेरिकी सरकार के लिए ईरान अब एक ऐसी गुत्थी बन गया है जिसे सुलझाना नामुमकिन लग रहा है। अगर वे हमला करते हैं, तो पूरा क्षेत्र जल उठेगा। अगर वे प्रतिबंध बढ़ाते हैं, तो ईरान और ज्यादा आक्रामक हो जाएगा। अमेरिका फिलहाल एक ऐसी स्थिति में है जहां उसके पास विकल्प बहुत कम बचे हैं।
पेंटागन की रिपोर्टें अक्सर ईरान के बढ़ते परमाणु कार्यक्रम की चेतावनी देती हैं। ईरान कहता है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण है, लेकिन बातचीत बंद होने का मतलब है कि अब कोई निरीक्षण भी नहीं होगा। यह पूरी दुनिया के लिए एक खतरनाक मोड़ है। जब निगरानी हट जाती है, तो अंधेरे में क्या पक रहा है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है।
आपको क्या लगता है? क्या केवल बातचीत बंद कर देने से ईरान सुरक्षित हो जाएगा? शायद नहीं। लेकिन तेहरान का यह सख्त रवैया बताता है कि वे अब किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। वे जानते हैं कि जंग महंगी होगी, लेकिन उनके लिए गुलामी उससे भी ज्यादा महंगी है।
ईरान की इस घोषणा के बाद अब गेंद अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पाले में है। अगर आप इस क्षेत्र में निवेश कर रहे हैं या यहां की राजनीति पर नजर रखते हैं, तो आने वाले दिन बहुत हलचल भरे होने वाले हैं। अपनी रणनीति बदलें क्योंकि पुराने कूटनीतिक नियम अब कचरे के डिब्बे में जा चुके हैं। ईरान ने अपनी लकीर खींच दी है, अब देखना यह है कि दुनिया उसे पार करने की हिम्मत जुटा पाती है या नहीं।