मध्य पूर्व का पूरा समीकरण बदल चुका है। जो देश कभी ईरान की उंगली पकड़कर चलता था, आज वही उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ने पर आमादा है। सीरिया और इराक की सीमा पर हाल ही में जो कुछ हुआ, उसने तेहरान से लेकर बेरूत तक हड़कंप मचा दिया है। इराक से सीरिया के रास्ते लेबनान भेजे जा रहे मिसाइलों और आधुनिक हथियारों के एक बहुत बड़े जखीरे को जब्त कर लिया गया। यह कोई सामान्य जब्ती नहीं है। यह सीरिया की नई हुकूमत का दुनिया को एक सीधा संदेश है कि अब दमिश्क में ईरान की मनमानी नहीं चलेगी।
सबसे बड़ा बदलाव सीरिया के इस फैसले के पीछे की अदृश्य ताकत में है। यह ताकत कोई और नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति है। ट्रंप के व्हाइट हाउस में आते ही मध्य पूर्व की बिसात पर मोहरे तेजी से हिले हैं। जो सीरिया कल तक हिज्बुल्लाह का सबसे बड़ा मददगार और हथियार सप्लाई का मुख्य जरिया था, आज वही हिज्बुल्लाह के खिलाफ मोर्चा खोलकर खड़ा हो गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने लेबनान में बैठे हिज्बुल्लाह के आकाओं की नींद उड़ा दी है। चलिए समझते हैं कि जमीन पर असल में क्या चल रहा है और इस बड़े खेल के पीछे की इनसाइड स्टोरी क्या है।
सीमा पर जब्ती और ईरान का टूटता सपना
इराकी सीमा से सीरिया में प्रवेश कर रहे ट्रकों के एक काफिले को सीरियाई सुरक्षा बलों ने अचानक घेर लिया। खुफिया इनपुट बिल्कुल सटीक थे। इन ट्रकों में फल और सब्जियों के नीचे भारी मात्रा में कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन के पुर्जे और सटीक निशाना लगाने वाले गाइडेंस सिस्टम छिपाकर रखे गए थे। यह पूरी खेप इराक के शिया मिलिशिया समूहों द्वारा हिज्बुल्लाह के लिए भेजी जा रही थी।
सीरियाई बलों ने न सिर्फ इस खेप को पकड़ा, बल्कि हथियारों को तुरंत कब्जे में लेकर अपने गुप्त ठिकानों पर भेज दिया। यह सीधे तौर पर ईरान के मुंह पर तमाचा था। सालों से ईरान इसी जमीनी रास्ते का इस्तेमाल करके हिज्बुल्लाह को हथियारों से लैस करता आया है। इस रास्ते को 'शिया क्रेसेंट' या ईरान का लैंड कॉरिडोर कहा जाता था। अब इस कॉरिडोर पर सीरिया ने खुद ताला लगा दिया है।
ईरान ने इस जब्ती का विरोध करने की कोशिश की, लेकिन दमिश्क से उन्हें साफ कह दिया गया कि सीरियाई जमीन का इस्तेमाल अब किसी भी विदेशी ताकत के फायदे के लिए नहीं होने दिया जाएगा। यह बदलाव रातोंरात नहीं आया। इसके पीछे एक बहुत बड़ी राजनीतिक बिसात बिछाई गई है।
डोनाल्ड ट्रंप की वो डील जिसने दमिश्क को बदल दिया
सीरिया में सत्ता परिवर्तन के बाद जो नई हुकूमत आई है, उसे सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय मान्यता और आर्थिक मदद की जरूरत है। सालों के युद्ध ने सीरिया को कंगाल बना दिया है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मौके को बखूबी भांप लिया।
ट्रंप ने सीरियाई नेतृत्व को एक सीधा और साफ प्रस्ताव दिया। प्रस्ताव बहुत सरल था। सीरिया को मिलने वाली अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी, बशर्ते वह ईरान और हिज्बुल्लाह से अपने सारे रिश्ते तोड़ ले। ट्रंप का विजन हमेशा से 'अमेरिका फर्स्ट' और बिजनेस डील जैसा रहा है। उन्होंने सीरिया को समझाया कि अगर वे ईरान के साथ खड़े रहेंगे, तो उन्हें केवल तबाही और इजरायली हवाई हमले मिलेंगे। इसके विपरीत, अगर वे अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ आते हैं, तो सीरिया के पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर का निवेश आएगा।
सीरिया के नए हुक्मरानों के लिए यह घाटे का सौदा नहीं था। उन्हें समझ आ गया कि हिज्बुल्लाह के लिए अपने देश को युद्ध की भट्टी में झोंकने का कोई मतलब नहीं है। ट्रंप के कहने पर सीरिया ने हिज्बुल्लाह से दूरी बनाना शुरू किया और अब यह दूरी खुले टकराव में बदल चुकी है।
खाड़ी देशों का परदे के पीछे से समर्थन
इस पूरी योजना में सिर्फ अमेरिका ही शामिल नहीं है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे खाड़ी देश भी ट्रंप की इस कूटनीति को आर्थिक ताकत दे रहे हैं। खाड़ी देश लंबे समय से चाहते थे कि सीरिया से ईरानी प्रभाव को पूरी तरह खत्म किया जाए।
सऊदी अरब ने सीरिया को भरोसा दिया है कि जैसे ही वह हिज्बुल्लाह को पूरी तरह से अलग-थलग करेगा, रियाद सीरिया के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए अपना खजाना खोल देगा। सीरिया के लिए यह एक जीवनदान जैसा है। ईरान के पास खुद पैसे की कमी है, वह सीरिया को सिर्फ हथियार दे सकता था, विकास नहीं।
हिज्बुल्लाह के लिए यह कितना बड़ा झटका है
हिज्बुल्लाह के लिए सीरिया का यह यू-टर्न किसी बड़े सदमे से कम नहीं है। इजरायल के लगातार हमलों के बाद हिज्बुल्लाह वैसे ही कमजोर हो चुका है। उसके कई शीर्ष कमांडर मारे जा चुके हैं और उसके बंकर तबाह हो गए हैं। ऐसे समय में उसे इराक और ईरान से आने वाले हथियारों की सख्त जरूरत थी।
सीरिया के इस कदम से हिज्बुल्लाह के सामने कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
- सप्लाई लाइन का पूरी तरह कटना: लेबनान के पास अपनी कोई बड़ी हथियार बनाने की क्षमता नहीं है। वह पूरी तरह सीरिया के रास्ते आने वाली खेप पर निर्भर रहता है। अब यह रास्ता बंद हो चुका है।
- इजरायली हमलों से बचने की जगह खत्म: पहले हिज्बुल्लाह के लड़ाके इजरायली हमलों से बचने के लिए सीरियाई सीमा के पार सुरक्षित ठिकानों में छिप जाते थे। अब सीरियाई सेना उन्हें अपनी सीमा में घुसने भी नहीं दे रही है।
- सामरिक रूप से अकेला पड़ना: उत्तर में सीरिया के हाथ खींचने और दक्षिण में इजरायल के दबाव के बाद हिज्बुल्लाह अब लेबनान के भीतर ही घिर कर रह गया है।
सीरिया ने केवल हथियारों की खेप ही नहीं रोकी है, बल्कि देश के भीतर सक्रिय हिज्बुल्लाह के कई ठिकानों को खाली करने का अल्टीमेटम भी दे दिया है। दमिश्क के आसपास के इलाकों से हिज्बुल्लाह के झंडे और दफ्तर हटाए जा रहे हैं।
इराक की लाचारी और ईरान की छटपटाहट
सीरिया की इस कार्रवाई से सबसे ज्यादा गुस्सा ईरान और इराक के शिया मिलिशिया गुटों में है। इराक में सक्रिय कताइब हिज्बुल्लाह और अल-नुजबा जैसे गुटों ने इस जब्ती को विश्वासघात करार दिया है। लेकिन वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
इराक खुद एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है। बगदाद की सरकार अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से खुलकर इन शिया मिलिशिया गुटों का साथ नहीं दे पा रही है। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि अगर इराक से हिज्बुल्लाह को हथियारों की तस्करी नहीं रुकी, तो इराकी बैंकिंग सिस्टम पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे। इस धमकी के बाद इराकी सरकार भी अपने स्तर पर सीमाओं पर चौकसी बढ़ाने के लिए मजबूर हुई है।
ईरान इस समय पूरी तरह बैकफुट पर है। उसके पास न तो आर्थिक ताकत बची है और न ही वह सीरिया के नए प्रशासन पर सैन्य दबाव बनाने की स्थिति में है। इजरायल के साथ सीधे टकराव ने तेहरान की सैन्य क्षमता को भी काफी सीमित कर दिया है।
आने वाले दिनों में क्या होगा
मध्य पूर्व में चल रहा यह खेल बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। सीरिया का यह कदम सिर्फ एक बानगी है। आने वाले हफ्तों में सीरियाई सीमा पर और भी बड़ी सैन्य हलचल देखने को मिल सकती है। सीरिया ने अपनी सेना को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सीमा पार से आने वाले किसी भी संदिग्ध वाहन की सघन तलाशी ली जाए।
क्षेत्रीय समीकरणों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि सीरिया अब आधिकारिक रूप से अरब लीग के मुख्य धड़े के साथ अपनी पहचान मजबूत करना चाहता है। इसके लिए उसे ईरान की छाया से पूरी तरह बाहर निकलना ही होगा। ट्रंप की कूटनीति ने सीरिया को एक ऐसा रास्ता दे दिया है, जिस पर चलकर वह अपनी खोई हुई संप्रभुता और अर्थव्यवस्था को वापस पा सकता है। हिज्बुल्लाह के लिए अब लेबनान के भीतर अस्तित्व बचाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बनने जा रहा है।